नई दिल्ली ... सुप्रीम कोर्ट ने देश में महिलाओं और विशेष रूप से बालिकाओं के साथ होने वाले भेदभाव पर गहरी चिंता व्यक्त की है। सोमवार को एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि देश के कई हिस्सों में लैंगिक भेदभाव आज भी व्यापक रूप से व्याप्त है और कन्या भ्रूण हत्या इस सामाजिक बुराई का सबसे क्रूर और घिनौना उदाहरण है। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने गुरुग्राम के एक रेडियोलॉजिस्ट के खिलाफ पीसीपीएनडीटी अधिनियम, 1994 के तहत दर्ज मामले को रद करने से इनकार करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराध की पहली सीढ़ी गर्भस्थ शिशु के लिंग का निर्धारण करना है, जिसे कानूनन अपराध घोषित किया गया है।
कोर्ट ने कहा कि संसद ने न केवल लिंग निर्धारण और चयन को गैरकानूनी घोषित किया है, बल्कि गर्भाधान पूर्व और प्रसव पूर्व सभी संबंधित तकनीकों पर भी कड़ा प्रतिबंध लगाया है। पीठ के अनुसार, ‘निर्धारित प्रारूप में रिकार्ड बनाए रखना अनिवार्य है। रिकार्ड न रखना पीसीपीएनडीटी अधिनियम के तहत एक दंडनीय अपराध है। इस मामले में रेडियोलॉजिस्ट पर आरोप था कि उसने गर्भवती महिला की अल्ट्रासोनोग्राफी की थी, लेकिन रिकॉर्ड सही तरीके से नहीं रखे गए। कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि यह मामला अभी ट्रायल (मुकदमे) के अधीन है और इसे शुरुआत में ही खत्म नहीं किया जा सकता। ट्रायल के दौरान ही यह तय होगा कि आरोपित ने कानून के मुताबिक रिकॉर्ड रखा था या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि पीसीपीएनडीटी अधिनियम का मुख्य उद्देश्य देश में गिरते लिंगानुपात को रोकना और लिंग चयन पर अंकुश लगाना है। पीठ ने चेतावनी दी कि ‘लिंगानुपात में असंतुलन से महिलाओं के खिलाफ हिंसा, तस्करी और वधू-खरीद (ब्राइड-बाइंग) जैसी कुरीतियों में वृद्धि होने की संभावना रहती है।’ कोर्ट ने इस कानून को मानवीय अधिकारों से जोड़ते हुए कहा कि इस अधिनियम का पूरा ध्यान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत बालिकाओं के जीवन के अधिकार की रक्षा करना है।