लखनऊ (डीएनएन)। गांव के गलियारे से सफलता के उत्कर्ष को स्पर्श करने की युग मात्रा में कई ऐसे पड़ाव आते हैं, कि कुछ वही ठहर जाते है, कुछ वापस हो जाते है, कुछ बिरले ऐसे होते हैं जिनके लक्ष्य में उतिष्ठ जागृत प्राय वरानिबोधति यानी उठो जागो और आगे लक्ष्य को प्राप्त करो अर्थात चरैवैति चरैवैति सिद्धान्त की निरन्तरता को स्वयं में समाहित कर लेते है और सफलता के उत्कर्ष और लोकप्रियता के शिखर को स्वयं प्राप्त कर लेते हैं, कदचित ऐसे ही व्यक्तित्व के महाधनी रहे प्रो. डॉ. निशीथ राय आपके पिता प्रो. राम कमल राय, इलाहाबाद विश्व विद्यालय के प्रोफेसर रहे और कई साहित्यक पुस्तकों का लेखन किया, निशीथ जी में अपने पिता की आभा, गरिमा को पूर्ण छाप थी। वर्ष 2015 में मैं उनसे पहली बार मिला एक कुलपति की अति व्यस्तता के बावजूद विनम्रता सहृदय रूप में हमसे उनकी भेंट हुई। राष्ट्र भाषा हिन्दी की ‘श्री वृद्धि हेतु समर्पित साहित्यिक संस्था शब्द - सरिता की राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह में विशिष्ट अतिथि के लिये निवेदन किया, जिसे उन्होंने बड़ी सहजता के स्वयं स्वीकृति देते हुए। समारोह में सम्मिलित हुए।
यह हमारे लिये गौरवशाली क्षण था उनका सम्मान करने का और उनके अभिभाषण ने सभी को मंत्र मुग्ध किया, उससे उनसे सलाह मशविरा लेते हुए निरन्तरता बनी रही। उनकी सहजता और विनम्रता का स्पष्ट आंकलन इसी बात से है, कि उनके मिलने वालों में उच्चवर्गिय हाई फाई लग्जरी गाड़ियों से आने वालों का ताता लगा रहता था. दूसरी तरफ गाँव देहात से आने वाले लोग भी रहते थे। लेकिन सबको आदर और सम्मान से उनकी समस्या का यथोचित हल निकालना ही उनकी प्राथमिकता रहती रही। आज विशिष्ट जनों से आम जन मानस को स्मृति पटल में आज भी उसी भाव से रचे बसे हैं, आज उनके जन्म दिवस पर कोटि कोटि नमन।