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चुनाव आयोग में नियुक्ति कानून का सवाल

चुनाव आयोग में नियुक्ति कानून का सवाल

जेपी सिंह  12 Jul 2017      Email  

आजादी के 70 साल बाद भी कि चुनाव आयोग में नियुक्ति के लिए कोई कानून नहीं है। इसका खुलासा सुप्रीम कोर्ट में 2015 की एक जनहित याचिका की सुनवाई में हुआ। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति करते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 साल, जो पहले हो, का होता है जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष या 62 साल, जो पहले हो, का होता है। चुनाव आयुक्त का सम्मान और वेतन भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश के सामान होता है। इस संबंध में अब तक सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति करते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि संसद को ऐसे कानून बनाने चाहिए, जिससे चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके। न्यायालय ने यह टिपणी भी की है कि इस मामले को पूरी तरह सरकार के हाथ में छोड़ देना निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता के लिए ठीक नहीं है। चुनाव आयोग ने नियुक्तियों को लेकर एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 (2) के अंतर्गत यह प्रावधान है कि संसद चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए कानून का निर्माण करेगी, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो सका है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम संसद को ऐसा करने के लिए आदेश तो नहीं दे सकते, लेकिन अगर केंद्र सरकार इसके लिए संसद में कानून नहीं लाती है तो अदालत इस मामले में हस्तक्षेप कर गाइडलाइन जारी करेगी। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके सवाल उठाया गया गया था कि चुनाव आयोग में नियुक्तियों को लेकर कोई कानून क्यों नहीं है। इस याचिका की सुनवाई के दौरान सरकार ने कोर्ट से कहा कि अब तक जितनी भी नियुक्तियां हुई हैं, उनमें कोई गड़बड़ी नहीं है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 324(2) मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा है। इसके अनुसार उनकी नियुक्ति का अधिकार भारत के राष्ट्रपति को दिया गया है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को छोड़कर समय-समय पर निर्वाचन आयुक्तों की संख्या को निश्चित करने का अधिकार भी राष्ट्रपति के पास होता है। लेकिन चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाए गए नियम संसद द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन है। लेकिन संसद ने आज तक चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए कोई कानून नहीं बनाया है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के संबंध में संसद ने कोई कानून नहीं बनाया है। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 324 (5) में उन्हें पद से हटाए जाने का प्रावधान है। जिसके अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाए जाने के तरीके से यानी महाभियोग के जरिए ही हटाया जा सकता है। गौरतलब है कि 1949 में संविधान सभा में बहस के दौरान प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना ने सुझाव दिया था कि चुनाव आयुक्त कि नियुक्ति संसद के दोनों सदनों के दो तिहाई सदस्यों द्वारा कि जानी चाहिए। इस सुझाव पर संविधान सभा ने अनुच्छेद 342(2) शामिल किया था, जिसमें कहा गया है कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति संसद द्वारा बनाए गए कानून के अनुसार होगी। वर्ष 1974 में तारकुंडे समिति ने सिफारिश की थी कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष लोकसभा तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति द्वारा की जानी चाहिए। चुनाव आयोग में नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए नेता विपक्ष और मुख्य न्यायाधीश की सदस्यता वाले एक संवैधानिक पैनल के गठन की मांग की गई थी। जिसकी सुनवाई के दौरान कोर्ट ने केंद्र सरकार को सख्त हिदायत दी है कि अटॉर्नी जनरल से पूछा है कि क्या सीक्रेट बैलेट के जरिए नियुक्ति की जा सकती है। कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल ने इस मामले में स्थिति साफ करने को कहा है। चुनाव आयोग में नियुक्तियों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। चुनाव आयोग में नियुक्तियों को लेकर विवाद होते रहे हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले नवीन चावला की बतौर मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पद पर नियुक्ति को लेकर भाजपा ने सवाल उठाए थे। नियमों के मुताबिक वरिष्ठता के आधार पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की जाती है। आम तौर पर वरिष्ठता के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त और आयुक्तों की नियुक्ति की जाती है। लेकिन कई बार इस प्रक्रिया को लेकर सवाल भी खड़े हुए हैं। हाल ही में अचल कुमार ज्योति को नया मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया है, वो नसीम जैदी की जगह लेंगे, जिनका कार्यकाल 5 जुलाई को समाप्त हो रहा है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ज्योति की नियुक्ति को मंजूरी दे दी है। उन्होंने 6 जुलाई को कार्यभार संभाल लिया है। 64 वर्षीय ज्योति ने 13 मई 2015 को चुनाव आयुक्त का कार्यभार संभाला था। वह करीब सात माह तक इस पद पर रहेंगे, क्योंकि 65 वर्ष की आयु तक ही मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल रहता है। जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, उस दौरान ज्योति राज्य के मुख्य सचिव थे। इस नियुक्ति पर प्रतिक्रिया देते हुए गुजरात के पूर्व पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट ने ट्वीट किया- गुजरात सरकार के पूर्व मुख्य सचिव एके ज्योति नए मुख्य चुनाव आयुक्त होंगे। भारत को अब स्वतंत्र और स्वच्छ चुनाव को अलविदा कह देना चाहिए।
प्रशांत भूषण के माध्यम से अनूप बर्नवाल की ओर से दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि मुख्य निवार्चन आयुक्तों और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया होनी चाहिए। याचिका में उच्च और उच्चतम न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए स्वतंत्र प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहा है कि भारत निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्तों और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए भी ऐसी ही प्रक्रिया होनी चाहिए। याचिकाकर्ता ने चुनाव आयुक्त नियुक्त करने में सरकार को मिले कार्यकारी अधिकार को समाप्त करने और इसकी जगह एक उच्चस्तरीय समिति बनाने की मांग की है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष शामिल हों। कोर्ट ने पूछा कि क्यों न उसे खुद दखल देते हुए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर नियम बनाने चाहिए, ताकि आयुक्तों की स्वायत्तता बरकरार रह सके? केंद्र सरकार ने इसका जवाब एक सवाल से दिया। केंद्र ने पूछा, अगर संसद को लगता है कि कानून बनाने की जरूरत नहीं है तो क्या सुप्रीम कोर्ट को विधायिका में दखल देकर नियम बनाने चाहिए? कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले पर विस्तृत सुनवाई के बाद फैसला लेगा। अदालत अब इस मामले पर दो महीने बाद सुनवाई करेगी। कोर्ट में इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश खेहर और जस्टिस चंद्रचूड़ की पीठ कर रही है। कोर्ट ने कहा कि वह इस बात को बेहद महत्वपूर्ण मानता है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए नियम कायदे हों, क्योंकि वे निष्पक्ष चुनाव कराने में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। शीर्ष अदालत ने दो महीने बाद इस मामले की विस्तृत सुनवाई करने का फैसला किया है। हालांकि, अगली सुनवाई जस्टिस जगदीश सिंह खेहर के उत्तराधिकारी जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच करेगी। चीफ जस्टिस खेहर अगस्त में रिटायर हो रहे हैं।
गौरतलब है कि भारतीय चुनाव आयोग एक स्वायत्त व अर्ध-न्यायिक संस्था है। इसका गठन भारत में स्तवंत्र व निष्पक्ष रूप से प्रतिनिधिक संस्थानों में जन प्रतिनिधि चुनने के लिए किया गया था। भारतीय चुनाव आयोग की स्थापना 25 जनवरी, 1950 को की गई थी। आयोग में वर्तमान में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं। भारत जैसे बड़े और भारी जनसंख्या वाले देश में चुनाव कराना एक बहुत बड़ा काम है। संसद के दोनों सदनों-लोकसभा और राज्य सभा के लिए चुनाव बेरोक-टोक और निष्पक्ष हों, इसके लिए एक स्वतंत्र चुनाव (निर्वाचन) आयोग बनाया गया है।
भारत निर्वाचन आयोग के पास विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति आदि चुनाव से संबंधित सत्ता होती है, जबकि ग्रामपंचायत, नगरपालिका, महानगर परिषद और तहसील व जिला परिषद के चुनाव की सत्ता संबंधित राज्य निर्वाचन आयोग के पास होती है। चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। पहले यह अवधि 65 साल तक होती थी। प्रोटोकाल में चुनाव आयुक्त/ निर्वाचन आयुक्त का सम्मान और वेतन भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान होता है। मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद द्वारा महाभियोग के द्वारा ही हटाया जा सकता है।


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