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पर्यावरण व पानी के लिए करें मेड़बंदी, मेड़ पर लगाएं पेड़

पर्यावरण व पानी के लिए करें मेड़बंदी, मेड़ पर लगाएं पेड़

श्रीप्रकाश तिवारी  16 Sep 2019      Email  

गंगा सेवा मिशन के अध्यक्ष स्वामी आनंद स्वरूप से विशेष बातचीत

लखनऊ। गंगा सेवा मिशन के अध्यक्ष स्वामी आनंद स्वरूप कहना है कि आधुनिकीकरण और औद्योगीकीकरण के चलते विश्वभर में प्रकृति के साथ बड़े पैमाने पर जो खिलवाड़ हो रहा है, उसके मद्देनजर आमजन को पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक करने की जरूरत है। भारत में  तो जल संरक्षण बड़ी  चुनौती बन चुकी है। यूपी ही नहीं बल्कि दक्षिण भारत खासकर तामिलनाडु और केरल में भूगर्भ जल का अभाव है। अब तक सरकारें कोई कारगर उपाय नहीं कर पाई हैं। मौजूदा केंद्र सरकार भी जल संरक्षण को लेकर गंभीर नहीं दिखती है। कांग्रेस की सरकारों ने थोड़ा बहुत काम भी किया है। स्वामी ने कहा कि यह मानवजनित समस्या है और वही हल भी ढंढने में मदद कर सकता है। केंद्र व राज्य की सरकारों को चाहिए कि वह एक कानून बनाए जिसमें हर पांच एकड़ जमीन पर एक तालाब की व्यवस्था हो। यही नहीं हर जिले में 50 जलग्राम घोषित  किया जाए। सरकार ट्यूबेल कनेक्शन पर तत्काल प्रतिबंध लगाए। इसके साथ ही सरकार अभियान चलाकर मेड़बंदी करे और हर मेड़ पर पेड़ लगाने की  मुहिम शुरू करे ताकि जल संरक्षण की दिशा में रचनात्मक पहल की जा सके।  
स्वामी आनंद स्वरूप ने एक विशेष बातचीत में कहा कि जरूरत पड़ने पर किसानों को सिंचाई के लिए नदियों और नहरों से पानी देना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारी तादात में छायादार और फलदार बृक्ष लगाए जाने चाहिए। गंगा के साथ दुर्व्यवहार के लिए प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराते हुए स्वामी ने कहा कि वह खुद आगे आएं और एक नदी को व्यक्तिगत रूप से देख रेख करें। इसी तर्ज पर हर मंत्री को एक नदी की चिंता करनी चाहिए। यहीं नहीं जिस प्रकार लोग गैस सब्सिडी छोड़ते हैं ठीक उसी प्रकार भूगर्भ जल का उपयोग कम करें।  
स्वामी आनंद स्वरूप ने कहा कि अपनी छोटी-छोटी पहल से हम सब मिलकर प्रकृति के संरक्षण के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। प्रयास करें कि हमारे दैनिक क्रियाकलपों से कार्बन डाईऑक्साइड जैसी गैसों का उत्सर्जन कम से कम हो। पानी की बचत के तरीके अपनाते हुए जमीनी पानी का उपयोग भी केवल आवश्यकतानुसार ही करें। जहां तक संभव हो, वर्षा के जल को सहेजने के प्रबंध करें। प्लास्टिक की थैलियों को अलविदा कहते हुए कपड़े या जूट के थैलों का प्रयोग करें। बिजली बचाकर ऊर्जा संरक्षण में अपना अमूल्य योगदान दें। तमाम बिलों के ऑनलाइन भुगतान की व्यवस्था हो ताकि कागज की बचत की जा सके और वृक्षों पर कम से कम कुल्हाड़ी चले। प्रकृति के बार-बार अपनी मूक भाषा में चेतावनियां देकर हमें सचेत करती रही है। इसलिए स्वच्छ और बेहतर पर्यावरण के लिए जरूरी है कि हम प्रकृति की इस मूक भाषा को समझें और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अपना-अपना योगदान दें।
कितना अच्छा हो अगर हम सब प्रकृति के संरक्षण में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाने का संकल्प लेते हुए अपने-अपने स्तर पर ईमानदारी से अमल भी करें। दरअसल आज प्रदूषित हो रहे पर्यावरण के जो भयावह खतरे हमारे सामने आ रहे हैं, उनसे शायद ही कोई अनभिज्ञ हो और हमें यह स्वीकार करने से भी गुरेज नहीं करना चाहिए कि इस तरह की समस्याओं के लिए कहीं न कहीं जिम्मेदार हम स्वयं भी हैं। हमें कपड़े या जूट का थैला साथ लेकर बाजार जाने के बजाए पॉलिथीन में सामान लाना ज्यादा सुविधाजनक लगता है। हम पॉलिथीन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को नजरअंदाज कर देते हैं। जहां तक गहराते जल संकट की बात है तो इसके लिए भी हम जिम्मेदार हैं। अक्सर देखा जाता है कि टूथपेस्ट करते समय या शेविंग करते समय हम नल खुला छोड़ देते हैं और पानी लगातार बहता रहता है।
पहले जान लें कि प्रकृति है क्या? प्रकृति के तीन प्रमुख तत्व हैं जल, जंगल और जमीन, जिनके बगैर प्रकृति अधूरी है। यह विडंबना ही है कि प्रकृति के इन तीनों ही तत्वों का इस कदर दोहन किया जा रहा है कि इसका संतुलन डगमगाने लगा है। प्रकृति के साथ हम बड़े पैमाने पर जो छेड़छाड़ कर रहे हैं, उसी का नतीजा है कि पिछले कुछ समय से भयानक तूफानों, बाढ़, सूखा, भूकंप जैसी आपदाओं का सिलसिला तेजी से बढ़ा है। कोई भी बड़ी प्राकृतिक आपदा आने पर हम प्रकृति को कोसना शुरू कर देते हैं। लेकिन हम नहीं समझना चाहते कि प्रकृति तो रह-रहकर अपना रौद्र रूप दिखाकर हमें सचेत करने का प्रयास करती रही है। अगर हम अभी भी नहीं संभले और हमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया तो हमें आने वाले समय में इसके खतरनाक परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। प्रकृति हमारी मां के समान है, जो हमें अपने प्राकृतिक खजाने से बहुमूल्य चीजें प्रदान करती हैं। लेकिन अपने स्वार्थों के चलते हम अगर खुद को ही प्रकृति का स्वामी समझने की भूल करने लगे हैं तो फिर भला प्राकृतिक तबाही के लिए प्रकृति को कैसे दोषी ठहरा सकते हैं। दोषी तो हम स्वयं हैं जो इतने साधनपरस्त और आलसी हो चुके हैं कि अगर हम अपने घर के आसपास के 100-200 मीटर के दायरे से भी घर के लिए कोई सामान लाना पड़े तो पैदल चलना हमें गवारा नहीं। हम सोचते ही नहीं कि छोटे-मोटे कार्यों की पूर्ति के लिए भी निजी यातायात के साधनों का उपयोग कर हम पेट्रोल, डीजल जैसे धरती पर ईंधन के सीमित स्रोतों को तो नष्ट कर ही रहे हैं। हमारे क्रियाकलापों के चलते ही वायुमंडल में कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन, पार्टिक्यूलेट मैटर, ओजोन प्रदूषण का मिश्रण इतना बढ़ गया है कि हमें वातावरण में इन्हीं प्रदूषित तत्वों की मौजूदगी के कारण सांस की बीमारियां जकड़ने लगी हैं। पेट्रोल, डीजल से पैदा होने वाले धुएं ने वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड और ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंचा दिया है। पर्यावरणीय असंतुलन के बढ़ते खतरों के मद्देनजर हमें खुद सोचना होगा कि हम अपने स्तर पर प्रकृति संरक्षण के लिए क्या योगदान दे सकते हैं।


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