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भीड़ की यह दुखदायी हिंसा

भीड़ की यह दुखदायी हिंसा

हृदयनारायण दीक्षित  09 Jul 2017      Email  

प्रकृति में सृजन का प्रवाह है। यहां प्रतिपल सृजन है। मनुष्य प्रकृति का ही वंशज है। उसे प्रकृति का नवसृजन दिखाई भी पड़ता है, लेकिन आधुनिक मनुष्य तोड़फोड़ और आगजनी में उत्सुक है। सामान्य दुर्घटनाओं में भी बसों या पुलिस वाहनों में आग लगाई जाती है। बसें बेचारी क्या करें? बसों के प्राण नहीं होते, उनसे कोई दुश्मनी भी नहीं। उनमें अपने ही परिजन यात्रा करते हैं। कभी-कभी वे उतर भी नहीं पाते और बसों में आग लगा दी जाती है। पुलिस की गाड़ियां भी सार्वजनिक संपदा है। आखिरकार हम अपनी ही संपदा को आग क्यों लगाते हैं? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कथित गोसंरक्षकों की हिंसक कार्रवाई की निंदा की है। नहीं पता कि ऐसी कार्रवाई क्या सुख देती है? भीड़ द्वारा अपने ही देश के निवासी को पीट-पीट कर मार डालने में कैसा सुख मिलता है? बिना किसी वैरभाव के ही हिंसा-हमला करने की इस मनोवृत्ति के स्रोत खोजना मनोवैज्ञानिकों के लिए भी कड़ी चुनौती है। प्रायः एकाकी व्यक्ति ऐसा नहीं करते, उन्मादी भीड़ ही निर्जीव और सजीव पर हमलावर रहती है। भीड़ का मनोविज्ञान व्यक्ति के मनोविज्ञान का संयुक्त जोड़ नहीं होता। इसे भारत के प्रचलित धर्म भाग का हिस्सा भी नहीं कहा जाना चाहिए। गाय निस्संदेह यहां श्रद्धा है। उसे ऋग्वैदिक समाज में भी अबध्य कहा गया है। अपने देश में हरेक व्यथा-निवारण के लिए कानून हैं। भीड़ कानून का दरवाजा नहीं ठकठकाती। तो क्या हम भारत के लोग अपनी मूलप्रवृत्ति से ही असभ्य और बर्बर हैं? ऐसा सोचना गलत है। आखिर भीड़ का भाग होते ही हिंसक हो जाने के कोई कारण तो होने ही चाहिए। गाय के मामले को संवेदनशील दृष्टि से विवेचन में लेना चाहिए। अनेक क्षेत्रों में भारत की स्वाभाविक आस्तिकता को चुनौती देते हुए बीफ  पार्टियां आयोजित की गई हैं। ऐसे आयोजनों का उद्देश्य बीफ  का स्वाद लेना नहीं जान पड़ता। इन आयोजनों में सीधी चुनौती है। लेकिन इस चुनौती का उत्तर हिंसा से नहीं दिया जा सकता। हिंसा हरेक परिस्थिति में अमानवीय और बर्बर है। बर्बर उन्माद के चलते हजारों बरस प्राचीन विश्व प्रतिष्ठ भारतीय सभ्यता और संस्कृति भी अपमानित हो रही है। क्या विचार का प्रतिकार विचार से ही नहीं किया जाना चाहिए। कथित सोशल मीडिया पर लाखों सूचनाएं होती हैं। संवाद प्रेषकों का अपना दृष्टिकोण है। ऐसे संवाद में तमाम अच्छी बातें भी होती हैं और तमाम भ्रामक उत्तेजक भी। कहा जाता है कि सूचनाओं की जांच करनी चाहिए। जांच के बाद ही विश्वास करना चाहिए। बहुत अंश तक यह बात सही भी है। मैं भिन्न मत रखता हूं। हम सारी सूचनाओं के प्रति तटस्थ भाव को ज्यादा उपयोगी मानते हैं। मूलभूत प्रश्न भारतीय जीवन मूल्यों का है। हम स्व्यं के भीतर झांक सकते हैं कि हमारे मन में हिंसा का लावा ही क्यों तप रहा है? आधुनिक समाज के पास साधारण मोबाइल उपकरण पर भी गीत, काव्य और तरह-तरह के संगीत हैं। सिनेमा सहित अनेक दृश्य श्रव्य माध्यम है। इनका उपयोग भी बढ़ा है। विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक चैनलों व यू-ट्यूब के उपभोक्ता करोड़ों में हैं। इन्हें देखते-सुनते हमारा चित्त सरल और तरल क्यों नहीं होता? काव्य गीत और संगीत मनुष्य को सभ्य और सांस्कृतिक बनाते हैं। गीत संगीत और तमाम कलाओं का प्रभाव आनंदवर्द्धन क्यों नहीं है?
आनंदित व्यक्ति तोड़फोड़ और हिंसा नहीं कर सकता। तनावग्रस्त व्यक्ति सृजन नहीं कर सकता। इसका उल्टा भी यही है। सृजन आनंददायी है और तोड़फोड़ दुखदायी। घर में चाय का कप तोड़ने वाले व्यक्ति दीनहीन और मानसिक रोगी की श्रेणी में आते हैं। घरेलू तोड़फोड़ सुरक्षित भी है। इसमें कानून का भय नहीं होता। सार्वजनिक तोड़फोड़ या हिंसा से कानून टूटता है। इसलिए एकाकी व्यक्ति इससे बचते हैं, लेकिन भीड़ में शामिल दीनहीन भी खुलकर अराजक हो जाते हैं। भीड़ ही उन्हें पराक्रम प्रकट करने का अवसर देती है। तो क्या बर्बरता मनुष्य की मूल प्रकृति है? ऐसा हो ही नहीं सकता। मानसिक रूप से रुग्ण लोगों की बात दूसरी है, वैसे बर्बरता और हिंसा कभी आनंद नहीं देती। कवि, कलाकार, संगीत से जुड़े लोग या साहित्यकार प्राकृतिक रूप में भी सहृदयी होते हैं। सृजन कर्म से जुड़े लोग हिंसक नहीं होते। वे अपनी चेतन ऊर्जा का रूपांतरण करते हैं। सिगमंड फ्रायड ने हिंसा को भी यौन ऊर्जा का रूपांतरण बताया है। लेकिन अथर्ववेद में ऋषि कवि अथर्वा ने कामदेव को कविता का पिता और समस्त अभिलाषाओं का जनक बताया है। सृजनशील चित्त के संवेदन आक्रामक नहीं होते।
जीवन अनंत अभिलाषाओं से भरापूरा है। सबका और हमारा भी। सोचता हूं कि समूची धरती के लोग सृजनशील होते तो सभी मनुष्यों के कार्य व्यापार और व्यवहार में गीतों जैसे पुलक होती। अपने पंथ या मजहब के लिए रक्तपात करते लोग गीत या काव्य गुनगुनाते अपने पक्ष को सही और दूसरे पक्ष को प्रिय बताते। अवनि अंबर गीतमय होता। शब्द मधुरस भरे होते। न सही काव्य सृजन या संगीत वादन, हम एक पौधा ही रोपते और उसकी कोंपलें बढ़ते देखकर आनंद उत्सव की चित्तदशा में होते। लेकिन हमारा सभ्य और 
मनुष्य होना भी प्रश्नवाचक हो रहा है। नासमझी और मूर्खता की भी कोई सीमा होनी चाहिए। हम निर्जीव बसों और जीपों को आग लगाकर पराक्रमी होना चाहते हैं। क्या ऐसे लोगों का मानसिक उपचार संभव है? मनोविश्लेषण में ऐसी चित्तवृत्ति को किसी आदिम स्वभाव से जोड़कर देखा जा सकता है। लेकिन आश्चर्य है कि तमाम सुविधाओं के बीच आधुनिक मनुष्य के मन में हिंसा, बर्बरता और तोड़फोड़ की अभिलाषा अभी भी जीवंत क्यों है? जीवन यात्रा की दिशाएं अनेक हैं। भारतीय चिंतन में दस दिशाएं हैं, काल भी अपना काम करता है। वासना जन्म और जीवन के साथ आई है। वासना अस्वाभाविक नहीं है। वासना एक दिशा है, लेकिन इसका कार्यव्यवहार दुखदायी है। लोकमंगल के विपरीत भी है। जीवन ऊर्जा की दूसरी दिशा प्रार्थना है। वासना और प्रार्थना दोनों में ही हमारी चेतन ऊर्जा ही मुख्य कारक है। दोनों में स्वयं के प्रति आस्तिकता है। लेकिन प्रार्थना में प्रार्थना के प्रति गजब का विश्वास है। ऋग्वेद में प्रार्थना है कि हे देवो, हमारा मन शुभ करो। यजुर्वेद में प्रार्थना है- हमारे मन को कल्याणकारी संकल्प से भरो। विरोधाभास ध्यान देने योग्य है। मन हमारा है, इसे शुभ या शिव बनाने की प्रार्थना हम दूसरे से क्यों करते हैं? प्रार्थना का अंतर्भूत तत्व ऐसा नहीं है। कोई देवता प्रार्थना सुनकर हमारा मन ठीक करे या न करे, लेकिन चित्त से उगी प्रार्थना हमारे चित्त के अणु-परमाणु को शिव तत्व से भर देती है। मैंने हजारों निबंध लिखे हैं। कोई पूछे कि इन सबका आधारभूत तत्व क्या है? मैं उत्तर देता हूं कि हमारा लेखन, भाषण और समूचा राजनीतिक कार्यव्यवहार प्रार्थना ही है। सिर्फ  प्रार्थना नहीं। प्रार्थना है कि हिंसा से भरे हमारे स्वजन संवेदनशील हों।
(लेखक संस्कृति दर्शन के सुपरिचित चिंतक और उत्तर प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष हैं)


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