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गंभीर सवाल, उथले जवाब

गंभीर सवाल, उथले जवाब

चैतन्य नागर   09 Jul 2017      Email  

कबीर के सबसे लोकप्रिय दोहों में एक है- जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। यहां हरि स्पष्ट रूप से रहस्यवादी दार्शनिक कवि का वह सत्य है जिसे वह अलग-अलग समय में अपने शब्दों में व्यक्त करता रहा है। यही जीवन का अंतिम सत्य है जिसके आगमन से जीवन अर्थपूर्ण हो उठता है। खलील जिब्रान, रूमी या विलियम ब्लेक इसी के लिए अपने खास शब्दों का प्रयोग करते हैं और कोई दार्शनिक इसे अन्य या पावन शब्द से भी इंगित करता है।
लेकिन मैं क्या है? मैं, व्यक्तिगत, एकवचन सर्वनाम, एक ऐसा शब्द है जिसका प्रयोग हम सबसे अधिक करते हैं। यह एक ऐसा केंद्र है जिसके इर्द गिर्द समूची भाषा का भवन ही निर्मित होता है। यदि हम कभी दो-चार पन्ने भी लिखें और उसे फिर से पढ़ें तो यह देखकर ताज्जुब होगा कि उसमें सबसे अधिक बार मैं शब्द ही आया है। जरूरी नहीं कि यह शब्द प्रत्यक्ष रूप से ही आए, यह अपने अतीत के अनुभवों, अपने अध्ययन, इकट्ठा किए गए ज्ञान के रूप में भी आ सकता है। पर कहीं न कहीं, हर क्षण इस शब्द की छाया हमारे जीवन में जरूर दिखेगी। यह शब्द हमारे बहुत करीब है। आत्मप्रेम प्रेम का सबसे प्राचीन रूप है और ऐसा कहा जाता है कि बाकी हर तरह का प्रेम इसी आत्मप्रेम की संशोधित अभिव्यक्ति भर होता है। अपने विचारों और भावनाओं की छानबीन करें तो यह बात बिलकुल साफ -साफ  नजर आएगी। पर एक सवाल उठता है कि क्यों इतने करीब होने के बावजूद हम इस मैं की गति और इसकी संरचना से न ही परिचित होते हैं और न ही परिचित होना चाहते हैं। इसे समझने के लिए हम इसकी गति में कोई स्वाभाविक रुचि नहीं रखते। जब इस पर कोई चर्चा भी होती है तो हम अक्सर मनोवैज्ञानिकों को या तथाकथित आध्यात्मिक पुस्तकों या गुरुओं को उद्धृत करके संतुष्ट हो जाते हैं। इस शब्द को लेकर कई रहस्यवादी धारणाएं हैं और खासकर धार्मिक किताबें इसके बारे में कई ऐसी बातें करती हैं कि एक समझदार, तार्किक व्यक्ति इस विषय को खुद से दूर रखना ही पसंद करता है।
मैं को अक्सर अहंकार का पर्याय भी माना जाता है। यह चतुर होता है और सूक्ष्म भी। इसकी तुलना अक्सर एक तिलचट्टे के साथ की जाती है जो कहीं भी छिप जाता है, ठंडे फ्रिज में भी और किसी गर्म, उमस भरे कोने में भी। इसकी तुलना ग्रीस के जल देवता प्रोटिअस के साथ भी की जाती है जो पकड़े जाते ही अपना रूप बदल देता है। एक तथाकथित संत जो अपने अहंकारी न होने और मैं से मुक्त होने का दावा करता है, उसके भीतर भी अपने संतत्व को लेकर भारी अहंकार हो सकता है। अपने ज्ञान को लेकर भी किसी में बहुत अहंकार हो सकता है। कोई समाज सेवी खुद को और दूसरों को यह पूरा भरोसा दिला सकता है कि वह सिर्फ  परोपकार के लिए काम कर रहा है, पर यह संभव है कि उसे अपने काम से जो शोहरत और प्रसिद्धि मिल रही है, वही उसके अहंकार को पोषित कर रही हो। इन सभी बातों का यह अर्थ नहीं कि लोगों को भले काम नहीं करने चाहिए, उन्हें दूसरों की मदद नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इसमें भी अहंकार है। इसका अर्थ सिर्फ  यही है कि मैं के भाव को, अहंकार की उपस्थिति को पहचानना आवश्यक है। नहीं तो खुद को और दूसरों को भी भ्रम में रखने का खतरा बना रहता है। गौर से देखा जाए तो जिसे हम मैं कहते हैं वह स्मृतियों, अनुभवों, संस्कारों और संकलित ज्ञान का एक पुलिंदा भर होता है। किसी भी बाहरी और अंदरूनी चुनौती का प्रत्युत्तर इसी पुलिंदे से आता है। इसलिए हमारे प्रत्युत्तर अक्सर यंत्रवत, यांत्रिक होते हैं, उनमें कोई नवीनता नहीं होती, इसलिए कि वे हमेशा एक ही गठरी में से निकल कर जो आते हैं। जिसे हम मन या चित्त कहते हैं, वह भी मैं का ही एक पर्याय है। मन के हठ, इसकी विचित्रताएं, इसकी पसंद और नापसंदगी- यह सबकुछ उन्हीं स्मृतियों से आता है, जिन्होंने मैं को निर्मित किया है। और, चित्त की रेखाएं आड़ी-तिरछी होती हैं और हमारा जीवन उनपर ही चलता है। हमारे विचार और भावनाएं, हमारे क्रिया कलाप सभी इन्हीं आड़ी-तिरछी रेखाओं से उपजते हैं। हमारी कई उलझनें इस मैं की संरचना को न समझ पाने की वजह से ही हैं।
थोड़ी सजगता जीवन को आसान बना सकती है। इसे देखा जा सकता है कि एक संसार हमसे बाहर है और ठीक वैसे ही एक और संसार सांस लेता है हमारे भीतर, अपने आप को व्यक्त करता है। इस भीतरी संसार और जो कुछ भी बाहर है, उनके बीच लगातार एक संवाद, एक द्वंद्व चलता रहता है। वाह्य आतंरिक में बदलता है और आतंरिक वाह्य को प्रभावित करता है। दोनों के बीच की यह क्रीड़ा ही जीवन है, जैसा कि हम इसे समझते हैं। कभी हमारे अपने मूड, भाव और विचार हम पर हावी हो जाते हैं और कभी बाहरी दुनिया हमें इतना प्रभावित कर देती है कि हम अपनी खुद की समझ खो बैठते हैं और इन्हीं प्रभावों के साथ प्रवाहित हो जाते हैं। 
आतंरिक की समझ पर धर्म और अध्यात्म का इतना प्रभाव है कि वह हमारी आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं बन पाया है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षक इससे न ही परिचित है और न ही उसे इसमें दिलचस्पी रखने की जरूरत महसूस होती है। इसके बगैर भी जीवन चल जाता है। जीवन मानो कि हमें यह आजादी देता है कि हम चाहें तो बेहोशी में, अज्ञानता में, उसके साथ भी रह सकते हैं, जो अनावश्यक होता है और जो आवश्यक है उसे पूरी तरह अनदेखा कर सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है, पर ऐसा है नहीं। संभवतः इसीलिए सुकरात ने करीब 2500 वर्ष पहले कहा कि एक अपरीक्षित जीवन जीने योग्य ही नहीं। यह बात सौ फीसदी सच लगती है, खासकर आज के माहौल में जब समूचा वैश्विक समाज एक तरह के विभ्रम और उलझन में जी रहा हो। जब कौमें और जाती तौर पर भी इंसान अंधाधुंध हिंसा और इसके स्थूल और सूक्ष्म अभिव्यक्तियों में लिप्त हो गया हो। ऐसे में यह जानना बहुत जरुरी है कि इन सभी चीजों की जड़ें हैं कहां? भीतर कहीं या सिर्फ  बाहर ही और यदि वे सिर्फ  भीतर या बाहर ही हों तो क्या उनके बीच कोई अंतरसंबंध भी है या दोनों अपने आप में स्वतंत्र अस्तित्व रखते हैं?                                       
यह सबकुछ एक गंभीर समझ का विषय है। सूचना के लगातार हो रहे विस्फोटों के बीच हम सूचनाओं को ही ज्ञान समझ बैठे हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट का हम उपयोग नहीं कर रहे, बल्कि ये ही हमारा उपयोग कर ले रहे हैं! सूचनाओं को ज्ञान और ज्ञान को प्रज्ञा समझ लेना एक सामान्य भूल है जिसका हम सभी शिकार हो चुके हैं। ऐसे में किसी भी गंभीर विषय  की सच्ची पड़ताल नहीं हो पाती। इंटरनेट और सोशल मीडिया की वजह से सूचनाएं भी सतही होती जा रही हैं। मनोरंजन उद्योग की गिरफ्त मन पर मजबूत होती जा रही है। एक तरह से हम सामूहिक अगंभीरता और सतहीपन के शिकार हो चले हैं। वैज्ञानिक शोध, अध्यात्म, आपसी संबंधों, साहित्य और संस्कृति का उथलापन यही संकेत देता है कि हम अब सिवाय भोग, चीजें बटोरने और धनलोलुपता के अलावा हर चीज को गौण मानने लगे हैं। हमारा समय लगातार हमारे सामने गंभीर सवाल रखता जाता है, पर हम अपने उथलेपन में फंसकर या तो उनका जवाब नहीं दे पाते या फिर आधे-अधूरे जवाबों के साथ संतुष्ट रह जाते हैं।


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