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पनामा पेपर्स मामले में पहली बड़ी कार्यवाही

पनामा पेपर्स मामले में पहली बड़ी कार्यवाही

जाहिद खान  21 Jun 2017      Email  

चर्चित पनामा पेपर्स खुलासे के एक साल बाद पहली बड़ी कार्यवाही करते हुए प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने दिल्ली के मेहरा संस ज्वैलर्स के सात करोड़ रुपए जब्त कर लिए हैं। ईडी ने इस मामले में विदेशों में जमा कालेधन को जब्त करने वाले कड़े कानून का इस्तेमाल किया है। फेमा यानी विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून में बदलाव के बाद विदेश में रखी अवैध संपत्ति जब्त करने के लिए मिले अधिकारों के तहत ईडी की ओर से देश में यह पहली कार्यवाही है। कानून के तहत लोगों को पहले तो विदेशों में जमा कालेधन का खुलासा करने के लिए 30 सितंबर, 2016 तक समय दिया गया था। इसके बाद विदेश में जमा कालेधन को जब्त करने का प्रावधान था। कार्यवाही के तहत संबंधित फर्म के सात करोड़ रुपए की विदेशी संपत्ति के एवज में इतनी ही रकम के बैंक डिपॉजिट अटैच कर दिए हैं। इस कार्यवाही के बाद उम्मीद बंधी है कि प्रवर्तन निदेशालय अपनी जांच का दायरा उन पांच सौ भारतीयों तक बढ़ाएगा, जिनके नाम इन पेपर्स में सामने आए थे। पनामा में रखे गए काले धन के बारे में कई चर्चित नाम उजागर हुए थे, इसमें उद्योगपति गौतम अडाणी के बड़े भाई विनोद अडाणी, लोकेश शर्मा, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह, कई सरकारी अभियानों के ब्रांड एम्बेसडर अभिनेता अमिताभ बच्चन, पूर्व विश्व सुंदरी ऐश्वर्या राय, नीरा राडिया, डीएलएफ  के ऑनर केपी सिंह, इंडिया बुल्स के समीर गहलोत, क्रॉम्पटन ग्रीव्ज के गौतम थापर, करण थापर, इंडियन क्रिकेट टीम का हिस्सा रह चुके अशोक मल्होत्रा आदि का पनामा में खाता होने का जिक्र है। पिछले तीन सालों में काला धन मामले में कई खुलासे हुए हैं, पर अब तक मोदी सरकार ने इन पर कोई कार्रवाई नहीं की है। पनामा पेपर्स मामले के खुलासा होने के बाद, कहने को सरकार ने इसकी जांच के लिए एक मल्टी एजेंसी ग्रुप बना दिया था, जिसमें केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड और भारतीय रिजर्व बैंक से जुड़े प्रतिनिधि शामिल हैं। मल्टी एजेंसी ग्रुप को गठित हुए एक साल होने को आया, लेकिन मामले की जांच पूरी होने का नाम नहीं ले रही। इंतजार और लंबा होता जा रहा है। 
पनामा खुलासे में मेहरा परिवार के विदेशी निवेश का भी जिक्र था। बहरहाल जब मामले की जांच की गई तो बात सही निकली। ईडी के मुताबिक मेहरा संस के एके मेहरा, दीपक मेहरा, शालिनी मेहरा और नवीन मेहरा ने आरबीआई की किफायती रेमिटेंस योजना का दुरुपयोग कर करोड़ों रुपए देश से बाहर भेजे। आरोपी व्यक्तियों ने ब्याज मुक्त ऋण के तौर पर यह पैसा पहले, ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड स्थित कंपनियों को भेजा। फिर यह पैसा यूएई की एक कंपनी को भेजा गया, जिसका संबंध भी मेहरा परिवार से निकला। ईडी की इस कार्यवाही के बाद, हालांकि मेहरा परिवार ने यह बात मानी है कि उनके परिवार की स्टोनबे और मैक्सहिल नाम से विदेश में दो कंपनियां हैं और इन कंपनियों को साल 2010 में आरबीआई की लोकप्रिय रेमिटेंस स्कीम के तहत स्थापित किया गया था। लेकिन उनके परिवार ने यह बात मानने से साफ  इंकार कर दिया है कि उन्होंने कुछ गलत किया है। मेहरा परिवार का अपनी सफाई में कहना है कि स्कीम के तहत और कानूनों का पूरी तरह पालन करते हुए ही बैंकिंग माध्यम से पैसा इन कंपनियों को भेजा गया। इसकी पूरी जानकारी आयकर विभाग को थी। इसके अलावा पांच जिन अन्य कंपनियों की बात की जा रही है, उनका परिवार से कोई लेना-देना नहीं है। 
यह महज इत्तेफाक है कि पनामा पेपर लीक्स मामले में जिस दिन भारत में पहली कार्यवाही हुई, ठीक उसी दिन पाकिस्तान में भी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ , इसी मामले में संयुक्त जांच दल यानी जेआईटी के सामने पेश हुए। उनसे करीब तीन घंटे तक पूछताछ चली। भ्रष्टाचार मामले में जांच समिति के सामने पेश होने वाले वह पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री हैं। जेआइटी ने नवाज शरीफ  के भाई और पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ  को भी अपना बयान दर्ज कराने को कहा है। यह समिति शरीफ  के बेटों हुसैन और हसन से अनुचित कारोबार के मामले में पहले ही पूछताछ कर चुकी है। वहीं नवाज शरीफ  के दामाद मोहम्मद सफदर की इस कमेटी के सामने 25 जून को पेशी होगी। पनामा पेपर्स लीक से पता चला था कि शरीफ  के बेटे हसन और हुसैन और बेटी मरियम के नाम पर लंदन में चार फ्लैट खरीदे गए। इसके अलावा नवाज शरीफ  परिवार पर कतर समेत कई देशों में फर्जी कंपनियां बनाकर कालाधन सफेद करने का भी इल्जाम है। चूंकि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ  खुद पाकिस्तानी संसद में संपत्ति पर हलफनामा दे चुके हैं, लिहाजा उन पर झूठा बयान देने का इल्जाम भी लगा है। पनामा गेट कांड में नवाज शरीफ  के अलावा दुनिया के कई देशों की प्रभावशाली हस्तियों के नाम सामने आए थे। तब से लेकर अब तक इस मामले में कई देशों में कार्रवाई की गई है और दुनिया के कई देशों में फिलहाल इस पर कार्रवाई करने की प्रक्रिया चल रही है। 
पनामा पेपर्स गोपनीय दस्तावेज हैं, इसमें इस बात का जिक्र है कि किस तरह दुनिया भर के अमीर लोगों ने अपना काला धन सरकार से छिपा कर टैक्स हैवन माने जाने वाले देश, पनामा में जमा कराया है, ताकि टैक्स न देना पड़े। पनामा में विदेशी निवेश पर कोई टैक्स नहीं लगता। पनामा पेपर्स, खोजी पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय संगठन इंटरनेशल कंसार्शियम ऑफ  इनवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स यानी आईसीआईजे की पूरे एक साल की गहन छानबीन का नतीजा है। आईसीआईजे ने मध्य अमेरिकी देश पनामा में स्थित दुनिया की चौथी सबसे बड़ी लॉ फर्म ‘मोजाक फोंसेका’ के एक करोड़ दस लाख दस्तावेजों की छानबीन कर जब पिछले साल अपनी रिपोर्ट जारी की तो दुनिया भर में इससे तहलका मच गया। पनामा पेपर्स से पता चलता है कि मोजाक फोंसेका नाम की कानूनी सहायता प्रदान करने वाली यह कंपनी दुनिया भर के तमाम राष्ट्र प्रमुखों, नेताओं, कारोबारियों और मशहूर हस्तियों के पैसे का बंदोबस्त करने के लिए फर्जी कंपनियां खुलवाती है और उनमें निवेश करवाती है। विदेशों में काला धन जमा करने वालों की इस काली फेहरिस्त में दुनिया के 72 मौजूदा या पूर्व हो चुके राष्ट्र प्रमुखों ने फर्जी कंपनी बनाकर अपना पैसा यहां रखा है। इस फेहरिस्त में पांच सौ भारतीय भी शामिल हैं। जिनमें कुछ सियासतदानों के अलावा कारोबार तथा सिनेमा की कई जानी-मानी हस्तियों के नाम हैं। 
भारत में देश से बाहर जमा काले धन को लेकर पनामा पेपर्स से पहले और भी कई खुलासे हुए हैं। मसलन संप्रग सरकार के दौरान फ्रांस ने स्विट्जरलैंड के उन गुप्त खातों की जानकारी दी थी, जो कुछ भारतीयों से संबंधित थे। इसी तरह एक और ‘टैक्स हैवन’ देश में खोले गए गुप्त खातों के बारे में जर्मनी ने बताया था। उसके कुछ दिन बाद एचएसबीसी के खाते लीक हुए, लेकिन काले धन कुबेरों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सभी चुनावी सभाओं में काले धन वापस लाने के बड़े-बड़े वादे करते थे, लेकिन केंद्र की हुकूमत में आने के बाद उनके ये वादे हवा-हवाई हो गए हैं। उन्होंने न सिर्फ  काले धन मुद्दे पर खामोशी अख्तियार कर ली है, बल्कि लोकपाल के मुद्दे पर भी जरा सा संजीदा नहीं हैं। मोदी सरकार ने बीते तीन सालों में काला धन जमा करने वालों पर यह पहली बड़ी कार्यवाही की है। वरना गैर कानूनी पैसा रखने वालों और फर्जी कंपनी चलाने वालों के ऊपर सरकार ने अभी तलक सिर्फ  देखने-दिखाने को ही कार्यवाही की है। जिन लोगों ने विदेशों में रखे गए अपने धन और संपत्ति उजागर नहीं की, सरकार उनको अभी तलक महज नोटिस ही दे पाई है। काले धन का पता लगाने के लिए मोदी सरकार ने जिस एसआईटी का गठन किया है, उसका भी सेहरा सुप्रीम कोर्ट के सिर है। जिसने एसआईटी के गठन के लिए समय-सीमा पहले से तय कर रखी थी। पनामा पेपर्स में जिन भारतीयों के नाम सामने आए हैं, कायदे से सरकार को इसकी पहले निष्पक्ष जांच करानी चाहिए और जांच में जो भी दोषी पाए जाएं, उन पर कर चोरी और धन शोधन के मामलों में कड़ी कार्यवाही की जाए। पर सरकार में ऐसी कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखाई देती। जब मोदी सरकार, हजारों करोड़ रुपए की चोरी करने वाले आइपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी और विजय माल्या को अभी तलक देश में वापिस नहीं ला पाई है, तो पनामा पेपर्स मामले में जिसमें देश के नामी-गिरामी लोग शामिल हैं, सरकार उन पर कोई कार्यवाही करेगी?, दूर की कौड़ी लगता है। मोदी सरकार काले धन मामले में यदि वाकई गंभीर है, तो उसे पनामा पेपर्स मामले की विस्तृत जांच करानी चाहिए। इस मामले की जांच, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में गठित एसआईटी करे। यही नहीं एसआईटी अपनी जांच तय समय में पूरी करे और जांच में जो भी दोषी साबित हों, उन पर सरकार कड़ी कार्यवाही करे। 


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